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मेरा लहू नसों में दौड़ते फिरते
उनसे बातें किया करता है और
बेसब्री से उनके एक दीदार की
तमन्ना करता है।
मुझे डर है कि ये इंतजार
लम्बा न हो जाये
और लहू आँखों के ज़रिये
निकल न पड़े।
यदि ऐसा हुआ तो
मैं लहू के घूँट तो पी लूँगा,
पर इस बीच ह्रदय की धड़कनें
बंद हो गईँ तो
खुली आँखों के इंतजार का
क्या होगा?

यदि ऐसा हुआ तो मेरे जाने के बाद
मुझसे मिलने ज़रूर आना
और मेरी आँखों में झाँक कर
अपनी छवि हमेशा के लिये बसा जाना।
और एक बार,
आख़िरी बार,
फिर से पलट कर
मेरे रुह की तुम्हारे इंतजार की घड़ियाँ
किस क़दर ख़तम हुई है,
वो मेरे मुस्कुराते होंठों पर
देख जाना।

-प्रदीप बोथरा, कोलकाता

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