पलकों से बिखरे मोती…

0
237

माँगने का हक़ है तुमसे, इसीलिये माँग रही हूँ,
अपनी मोहब्बत के वादे निभाने की आरज़ू कर रही हूँ,
तुम्हारे बिना बेचैन हूँ यह एहसास करने की माँग कर रही हूँ,
मेरे अश्रुओं को तुम ही थाम सकते हो
इसलिये आकर इन्हें पोंछने की आरज़ू कर रही हूँ,
सीने में दर्द जो उजागर हुआ है,
उसमें मरहम लगाने की माँग कर रही हूँ,
तड़पते मन से निकलते धुँए को,
बुझाने की आरज़ू कर रही हूँ,
प्यार, विश्वास को तसल्ली देने,
पुनर्मिलन की माँग कर रही हूँ,
मेरी सूनी माँग को आकर,
फिर से भरने की माँग कर रही हूँ।
-प्रदीप बोथरा, कोलकाता

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here