नितिन गड़करी द्वारा प्रेस वार्ता के दौरान टोल टैक्स पर पत्रकारों, स्वतंत्रता सेनानियों, दिव्यांगों व महिलाओं के प्रति अभद्र टिप्पणी कहां तक जायज?

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नईदिल्ली। अभी कुछ दिन पहले केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी द्वारा की गई प्रेस वार्तालाप दौरान एक पत्रकार द्वारा टोल टैक्स-फ्री करने की बात को लेकर केंद्रीय मंत्री ने कड़वी व अभद्र-भाषा में जवाब देते हुए कहा (तुम्हें तो बिल्कुल नहीं मिलेगा) तुम पत्रकारों, दिव्यांगों व महिलाओं का यह रोज का धंधा नहीं चलेगा अच्छी सड़कों पर चलना है तो टोल टैक्स (Toll Tax) देना ही पड़ेगा। इस वार्तालाप के दौरान केंद्रीय परिवहन मंत्री द्वारा आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करने पर समस्त पत्रकारों ने रोष व्यक्त करते हुए आगामी समय में मंत्री नितिन गडकरी की प्रेस वार्ता का पूरी तरह से बहिष्कार करने व केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी द्वारा देश के चौथे स्तंभ पत्रकारों के लिए इस्तेमाल की गई अभद्र टिप्पणी को लेकर लखनऊ के एक पत्रकार ने इस मांग को उठाते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपील के तहत कहा, हम नितिन गड़करी से यह पूछना चाहते हैं कि उन्होंने चौथे स्तंभ पत्रकारों के अलावा स्वतंत्रता सेनानियों, दिव्यांगजनों व महिलाओं प्रति की गई अभद्र टिप्पणी जिसमें इन सभी का रोज का यह धंधा नहीं चलेगा, अच्छी सड़कें चाहिए तो टोल टैक्स हर हालत में देना ही पड़ेगा। पत्रकार कोई भिखारी नहीं होता लेकिन किसी मुद्दे पर सवाल करना पत्रकार का मौलिक अधिकार है उसे कोई छीन नहीं सकता। पत्रकार के इस सवाल का उत्तर आप संयम पूर्वक तरीके से भी दे सकते थे। इसमें रोजमर्रा के कौन से धंधे की बात आ गई? वह भी विशेषकर महिलाओं के लिए इस तरह की अभद्र भाषा इस्तेमाल करने के लिए केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी को स्वयं हर हालत में हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, दिव्यांगजनों, पत्रकारों व महिलाओं से हर हालत में माफी मांगनी होगी। क्या सता सरकार में बैठे मंत्रियों को इस तरह की अभद्र टिप्पणियां करना शोभनीय देता है? एक तरफ तो केंद्रीय सरकार दिव्यांगों और महिलाओं प्रति सुगमता तहत की गई कार्य प्रणाली के झूठे दावों से अपनी पीठ थपथपाते नजर आती है। दूसरी तरफ इन्हीं की सरकार में बैठे कुछ मंत्री बेतुके बयान देने पर हर पल आमादा रहते हैं। टोल टैक्स मुद्दे की बात पर स्वतंत्रता संग्राम, सेनानियों, दिव्यांग और महिलाओं व पत्रकार के प्रति उनके द्वारा उगले गए इस जहरनुमा बयान से पता चलता है उनके दिल में इन सब के प्रति कितना मान-सम्मान है।
मंत्री के बयान अनुसार यदि अच्छी सड़कें चाहिए तो टोल टैक्स देना ही पड़ेगा। तब यही सवाल हम केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से पूछना चाहते हैं कि अच्छी सड़कों पर तो मंत्री भी चलते हैं तब तो मंत्रियों को सबसे पहले टोल टैक्स (Toll Tax) देना अत्यंत अनिवार्य होना चाहिए। एक मंत्री सरकार से अच्छा वेतन पाने के बावजूद, सरकार की तरफ से हर मुफ्त सुविधाएं बिजली-पानी खाना, टोल-टैक्स,मेडिकल इत्यादि कई तरह की तमाम सुविधाओं का हकदार कैसे हो सकता है? हर महीने सरकारी वेतन पाने वाले को सरकारी कर्मचारी कहा जाता है कि आप समाज के लिए फ्री में सेवा कहां कर रहे हो? आमजन के टैक्स से सरकारी वेतन हासिल करने वाले को आमजन से अलग हटकर सरकारी सुविधाएं आखिर मुहैया क्यों करवाई जाएं? यह अपने आप में एक बड़ा ही अहम वह बड़ा सवाल है या तो आप सरकारी सुविधाएं लीजिए या फिर जनता के टैक्स के पैसे से वेतन लेना बंद कीजिए। आपको दोनों में से एक काम करना ही पड़ेगा। देश के अंदर एक आम नागरिक 60 साल बाद सरकारी पेंशन का हकदार और यह नेता पांच साल बाद पेंशन के हकदार कैसे हो सकते है? इस तरह के तमाम मुद्दे हैं जो राजनेताओं और आमजन के बीच दोहरे मापदंड वाली रणनीति को अपनाते नजर आते हैं। देश के संविधान के अंदर बनाए गए समानता अधिकार की यह राजनैतिक लोग सरेआम धज्जियां उड़ाते नजर आ रहे हैं। आखिर कहां है इस देश में समानता का अधिकार? क्या संविधान के अंदर इस समानता के अधिकार को सिर्फ कागजी लकीरों में ही उभारा गया है या कभी इसे धरातल पर भी सही से उतारा जाएगा? आखिर देश की जनता के साथ यह दोहरा मापदंड क्यों और किस लिए? मेरा यह मानना है यदि आप देश की फ्री में सेवा कर रहे हो तब आपको सरकारी सुविधाएं मिलना बिल्कुल जायज है। लेकिन यदि आप वेतन लेकर एक सरकारी कर्मचारी की तरह काम कर रहे हैं तब आपको देश के हर नागरिक की सुविधाओं से हटकर अन्य सुविधाएं मिलना बिल्कुल गलत व अमाननीय हैं। इसीलिए आप दोनों सुविधाओं में से एक का परित्याग हर हालत में करना ही पड़ेगा।

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